Monday, 2 May 2011

क्या पाओगे

राख के ढेर में खोजोगे तो क्या पाओगे |
हाथ मलते ही रहे हो और रह जाओगे ||
बेअदब होके कटेगी न जिन्दगी इक पल |
बा – अदब रहने से चैन सदा पाओगे ||
लक्ष्य लेकर के चलोगे अगर तुम राही बन |
समय के साथ ही मंजिल पे पहुँच जाओगे ||
खिलेंगे फूल बनके , शूल तेरी राहों में |
साथ देगा न कोई फिर भी पहुँच जाओगे ||
बाँध के आये हो मुट्ठी इस जहाँ में तुम |
खोल के हाथ यूँ ही तुम भी चले जाओगे ||
सोच लो जिन्दगी क्या है ? सिर्फ तमाशा है |
दिखा के खेल यूँ ही तुम भी चले जाओगे ||
नीयतें ठीक किसी की नहीं ज़माने में |
एक तुम ही“अतुल”क्या सबको बदल पाओगे ||
प्यार की राह पे चलना है तो काँटों से डर क्या |
कांटे क्यों फूल बनेगे ? तुम चले जाओगे ||
संभल के रहना ज़माने के हसीं फूलों से |
फूल के फेर में काँटों से छले जाओगे ||

क्या पाओगे ?

राख के ढेर में खोजोगे तो क्या पाओगे |
हाथ मलते ही रहे हो और रह जाओगे ||
बेअदब होके कटेगी न जिन्दगी इक पल |
बा – अदब रहने से चैन सदा पाओगे ||
लक्ष्य लेकर के चलोगे अगर तुम राही बन |
समय के साथ ही मंजिल पे पहुँच जाओगे ||
खिलेंगे फूल बनके , शूल तेरी राहों में |
साथ देगा न कोई फिर भी पहुँच जाओगे ||
बाँध के आये हो मुट्ठी इस जहाँ में तुम |
खोल के हाथ यूँ ही तुम भी चले जाओगे ||
सोच लो जिन्दगी क्या है ? सिर्फ तमाशा है |
दिखा के खेल यूँ ही तुम भी चले जाओगे ||
नीयतें ठीक किसी की नहीं ज़माने में |
एक तुम ही“अतुल”क्या सबको बदल पाओगे ||
प्यार की राह पे चलना है तो काँटों से डर क्या |
कांटे क्यों फूल बनेगे ? तुम चले जाओगे ||
संभल के रहना ज़माने के हसीं फूलों से |
फूल के फेर में काँटों से छले जाओगे ||

Sunday, 1 May 2011

तुम्हे अपना लिया है

नींद में सपने संजो कर रोज तुमको पा लिया है ,
निज नयन कि न्यून पुतरी में तुम्हें अंकित किया है |
मै तुम्हारा हूँ पुजारी बहुत पहले बन गया ,
मन के मंदिर में सदा मैंने तेरी पूजा किया है |
मन के मंदिर में बसी मूरत कि आभा है विमल ,
अतुल अर्चन ने सदा मूरत का धुंधला पन लिया है |
तुम मिलोगे आस लेकर बाट तेरी जोहता हूँ ,
मेरी किस्मत में तो शायद याद करना ही लिखा है |
प्रणय कि पाती नहीं तुमने लिखी तो क्या हुआ ,
दिल के कागज पर लिखा एक पत्र मैंने पा लिया है|
प्रणय की मैं यह तपस्या उम्र भर करता रहूँगा ,
एक दिन तुम स्वयं कह दोगे तुम्हे अपना लिया है |